नैनीताल/हल्द्वानी।हिंदी न्यूज, हाल के दिनों में एक निजी अस्पताल से जुड़ी घटना को लेकर सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। “बॉडी नहीं देने” और “₹80,000 का बिल थमाने” जैसे आरोपों ने न केवल अस्पताल प्रबंधन को कटघरे में खड़ा कर दिया, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर सवालिया निशान लगा दिया। ऐसे में ज़रूरी है कि इस पूरे मामले को भावनाओं के बजाय तथ्यों और व्यवस्था के संदर्भ में समझा जाए।
मृत्यु किसी भी परिवार के लिए असहनीय पीड़ा होती है। ऐसे समय में आक्रोश और सवाल स्वाभाविक हैं।लेकिन पत्रकारिता का दायित्व केवल भावनात्मकप्रतिक्रियाओं को उभारना नहीं, बल्कि सच की तह तक पहुँचना भी है।
“सिर्फ़ निजी अस्पताल ही निशाने पर क्यों?”
स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें तो सरकारी अस्पतालों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। प्रदेश के कई सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, लंबे इंतज़ार, बंद ICU और बार-बार रेफर किए जाने जैसी समस्याएँ आम हैं। कुमाऊँ के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सुशीला तिवारी में कार्डियोलॉजिस्ट का अभाव लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है, लेकिन इस मुद्दे पर न तो वैसी सुर्खियाँ बनीं और न ही व्यापक बहस हुई। अक्सर सरकारी व्यवस्था की कमियों को “सिस्टम फेल है” कहकर छोड़ दिया जाता है, जबकि किसी निजी अस्पताल की एक घटना को पूरे सिस्टम पर सवाल बना दिया जाता है। यह असंतुलन भी गंभीर विचार का विषय है।
“निजी अस्पताल: मजबूरी या विकल्प”
यह भी एक तथ्य है कि निजी अस्पताल किसी को जबरन इलाज के लिए नहीं बुलाते। लोग स्वयं वहाँ जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि वहाँ अच्छे डॉक्टर उपलब्ध होंगे, मशीनें काम कर रही होंगी और समय पर इलाज मिल सकेगा। आयुष्मान कार्ड की सुविधा के बारे में जानकारी लेकर और संतुष्ट होने के बाद ही अधिकांश लोग निजी अस्पतालों का रुख करते हैं। ऐसे में हर मामले में यह निष्कर्ष निकाल लेना कि “निजी अस्पताल लूट कर रहे हैं”, पूरी सच्चाई नहीं कही जा सकती।
“आयुष्मान योजना को लेकर भ्रम”
आयुष्मान भारत योजना को लेकर भी कई बार भ्रम की स्थिति बन जाती है। यह योजना OPD सेवाओं पर लागू नहीं होती, बल्कि मरीज के भर्ती होने के बाद ही इसके अंतर्गत इलाज की सुविधा मिलती है। OPD में ली गई फीस को “आयुष्मान होते हुए पैसा लिया गया” कहना तकनीकी रूप से सही नहीं है। यह तथ्य सरकारी दिशा-निर्देशों में स्पष्ट रूप से दर्ज है।
“इलाज और लापरवाही के बीच की रेखा”
चिकित्सा विज्ञान में सौ प्रतिशत सफलता की गारंटी नहीं होती। डॉक्टर हर संभव प्रयास करते हैं, लेकिन हर बार परिणाम अनुकूल हो, यह आवश्यक नहीं। यदि कहीं लापरवाही हुई है तो उसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई भी ज़रूरी है।हालाँकि, बिना जाँच और मेडिकल रिपोर्ट के सीधे आरोप लगाना न तो न्यायसंगत है और न ही समाज के हित में।
‘बॉडी नहीं दी गई’ आरोप पर सवाल’
सबसे गंभीर आरोप यही है, लेकिन इस पर भी कई प्रश्न उठते हैं। कोई भी अस्पताल जानबूझकर ऐसा कदम क्यों उठाएगा? कानून इसकी अनुमति कैसे देगा? ऐसे मामलों में तथ्यों की पुष्टि और आधिकारिक जाँच आवश्यक है,न कि केवल भावनात्मक बयानों के आधार पर निष्कर्ष। समाज में स्वास्थ्य सेवाएँ एक अत्यंत संवेदनशील विषय हैं। सवाल उठना ज़रूरी है, लेकिन संतुलन और समझदारी के साथ। यदि हर मामले में भीड़ का फैसला हावी हुआ, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को ही होगा।

पत्रकारिता का उद्देश्य किसी एक पक्ष को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि पूरी तस्वीर सामने रखना है। क्योंकि इलाज केवल एक खबर नहीं, बल्कि किसी की आख़िरी उम्मीद भी होता है।अगर हर ईमानदार अस्पताल भीड़ के गुस्से में टूटता रहा, तो कल सबसे ज़्यादा नुकसान आम आदमी का होगा। यही आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली हर खबर में संतुलन, तथ्य-जांच और संवेदनशीलता बनी रहे।
यह लेख केवल एक खबर नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार पत्रकार की आवाज़ है। इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचना चाहिए, ताकि बहस तथ्यों पर हो न कि नफरत और अफ़वाहों पर।
