रामनगर (नैनीताल), हिंदी न्यूज़ ,उत्तराखंड के रामनगर तहसील क्षेत्र के ग्राम पूछड़ी में 7 दिसंबर को हुई बेदखली कार्रवाई और कथित पुलिस-प्रशासनिक दमन के खिलाफ रविवार को सैकड़ों ग्रामीणों ने जोरदार प्रदर्शन किया। बुल्डोजर राज के खिलाफ संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले निकाले गए जुलूस में महिलाएं, बुजुर्ग और युवा बड़ी संख्या में शामिल हुए। जुलूस तहसील मुख्यालय पहुंचकर धरने में तब्दील हो गया।

ग्रामीणों ने उपजिलाधिकारी के माध्यम से कुमाऊं कमिश्नर को संबोधित पांच सूत्री ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं ।
♦ग्राम पूछड़ी सहित उत्तराखंड में चल रही सभी बेदखली और दमनात्मक कार्रवाइयों पर तत्काल रोक लगाई जाए।
♦7 दिसंबर को बेदखल किए गए सभी परिवारों का तुरंत पुनर्वास किया जाए।
♦महिलाओं व ग्रामीणों के साथ हुई मारपीट और अवैध हिरासत की उच्च स्तरीय या न्यायिक जांच कराई जाए।
♦उच्च न्यायालय के स्टे ऑर्डर का उल्लंघन करने के लिए जिम्मेदार डीएफओ प्रकाश आर्य सहित अन्य अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।
♦वन अधिकार कानून 2006 का सख्ती से पालन करते हुए प्रदेश के सभी वन ग्राम, गोठ और खत्तों को राजस्व ग्राम घोषित किया जाए।
तहसील परिसर में आयोजित सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि ग्राम पूछड़ी में पिछले साल ही ग्राम स्तरीय वन अधिकार समिति का विधिवत गठन हो चुका है। वन अधिकार कानून के तहत जब तक व्यक्तिगत व सामुदायिक अधिकारों का निर्धारण पूरा नहीं हो जाता, तब तक किसी भी ग्रामीण को उसकी जमीन और मकान से बेदखल नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद 7 दिसंबर की सुबह करीब 5 बजे वन विभाग और जिला प्रशासन ने भारी पुलिस बल के साथ बुल्डोजर लेकर धावा बोल दिया।

वक्ताओं ने आरोप लगाया कि जिन ग्रामीणों को उत्तराखंड हाईकोर्ट से स्टे ऑर्डर प्राप्त था और जिन्हें अभी सिर्फ नोटिस तक जारी हुआ था, उनके घरों पर भी बुल्डोजर चलाया गया। ग्राम वन अधिकार समिति की अध्यक्ष श्रीमती धना तिवारी और सदस्य श्रीमती सीमा तिवारी ने अधिकारियों को स्टे ऑर्डर दिखाने की कोशिश की, लेकिन इसके बावजूद उनको बुरी तरह पीटा गया और अवैध रूप से हिरासत में ले लिया गया। दर्जनों ग्रामीणों को पूरा दिन थाने में बंद रखा गया।
ग्रामीणों का कहना है कि उनकी गेहूं की तैयार फसल को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया और उजाड़ी गई जमीन पर नगर पालिका द्वारा कूड़ा डंप किया जा रहा है, जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है।
“भूमि ‘खाम’ है, वन विभाग 1990 में ही हार चुका मुकदमा : ग्रामीण”
वक्ताओं ने दावा किया कि विवादित भूमि मूल रूप से ‘खाम’ (गैर-मुमकिन) भूमि है जिसे वन विभाग ने 1966 में गैर-कानूनी तरीके से आरक्षित वन घोषित कर लिया था। काशीपुर न्यायालय में 1990 में वन विभाग यह मुकदमा हार चुका है। साथ ही सूचना का अधिकार के तहत वन विभाग ने स्टांप पेपर पर लिखित दिया है कि आरक्षित वन घोषित करने संबंधी मूल दस्तावेज उसके पास उपलब्ध नहीं हैं।

सभा में रामनगर क्षेत्र के कोने-कोने से पहुंचे सैकड़ों ग्रामीणों ने एक स्वर में ऐलान किया कि जब तक उनकी सभी मांगें पूरी नहीं होतीं, संघर्ष जारी रहेगा। आगामी रणनीति तय करने के लिए 9 दिसंबर को पूछड़ी एकता चौक में बड़ी बैठक बुलाई गई है।
सभा की अध्यक्षता संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजकों ने की तथा संचालन सरस्वती जोशी ने किया। सभा को पीपी आर्य, कैलाश पांडे, ललित उप्रेती, ललिता रावत, प्रभात ध्यानी, खीम राम, रेनु सैनी, नेहा, सोनम शेख, लालमणी, तुलसी छिंबाल, दीपक तिवारी, सीमा तिवारी, मौलाना अकरम, रमेश आर्य, महेश जोशी एवं जगमोहन रावत सहित कई लोगों ने संबोधित किया।ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर प्रशासन ने दमनकारी रवैया नहीं बदला तो आंदोलन को और उग्र रूप दिया जाएगा।
