वन ग्रामों को अधिकार दिलाने की लड़ाई तेज, प्रशासन पर लगे बेदखली के आरोप

‘ग्राम स्तरीय वनाधिकार समितियों ने दावों की प्रक्रिया और कानूनी अधिकारों पर की चर्चा’

नैनीताल /रामनगर,हिंदी न्यूज। वन ग्राम नई बस्ती पूछड़ी, कालूसिद्ध एवं सुंदरखाल, देवीचौड़ा खत्ता में गठित ग्राम स्तरीय वनाधिकार समितियों द्वारा संयुक्त रूप से व्यापार भवन, रामनगर में एक महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य वनाधिकार कानून–2006 की विस्तृत जानकारी देना तथा इसके अंतर्गत सामुदायिक एवं व्यक्तिगत दावों को तैयार करने की प्रक्रिया पर गहन चर्चा करना रहा।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए वन पंचायत संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष तरुण जोशी ने कहा कि दिसंबर 2005 से पूर्व वन भूमि पर निवास कर रहे सभी लोग वनाधिकार कानून के तहत पूर्ण रूप से पात्र हैं। उन्होंने बताया कि इस कानून के अंतर्गत वन ग्रामों को राजस्व ग्राम घोषित करने, अधिकतम चार हेक्टेयर तक की कब्जे वाली भूमि पर मालिकाना हक प्राप्त करने तथा वनों से अपनी पारंपरिक निस्तारी आवश्यकताओं को पूरा करने का कानूनी अधिकार सुनिश्चित किया गया है।

तरुण जोशी ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजातियों के लिए दिसंबर 2005 से पूर्व का निवास ही पर्याप्त साक्ष्य माना जाता है, जबकि अन्य परंपरागत वनवासियों को तीन पीढ़ियों, अर्थात लगभग 1980 से पूर्व से वन भूमि पर निवास का प्रमाण देना होता है। उन्होंने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि समाज कल्याण विभाग और जिला प्रशासन कानून का पालन कराने के बजाय परंपरागत निवासियों को उजाड़ने की कार्रवाई कर रहे हैं।

उन्होंने 7 दिसंबर को पूछड़ी में हुई तोड़फोड़ की घटना का जिक्र करते हुए उसे गैरकानूनी करार दिया और कहा कि कानून के अनुसार ग्राम स्तरीय वनाधिकार समिति के गठन के बाद, जब तक दावों के निस्तारण की पूरी प्रक्रिया संपन्न नहीं हो जाती, तब तक किसी भी प्रकार की बेदखली की कार्रवाई नहीं की जा सकती।

कार्यशाला में समाजवादी लोक मंच के संयोजक मुनीष कुमार ने आंकड़ों के माध्यम से राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि देशभर में वनाधिकार कानून के तहत दाखिल लगभग 52 लाख दावों में से करीब 48 प्रतिशत दावे स्वीकृत हो चुके हैं, जबकि उत्तराखंड में लगभग 7 हजार दावों में से 3 प्रतिशत से भी कम दावों का स्वीकार होना राज्य सरकार की जनविरोधी नीति को दर्शाता है।

मुनीष कुमार ने कहा कि टोंगिया ग्रामों को राजस्व ग्राम घोषित किए जाने के बावजूद वहां निवास कर रहे लोगों को अब तक मालिकाना हक नहीं दिया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि कालूसिद्ध, पूछड़ी और सुंदरखाल में ग्राम स्तरीय समितियों का गठन हुए एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन सरकार द्वारा अब तक खंड स्तरीय समिति का गठन नहीं किया गया, जिससे पूरी प्रक्रिया ठप पड़ी हुई है।

महिला एकता मंच की सरस्वती जोशी ने सरकार से मांग की कि वन ग्रामों में हो रही बेदखली की कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाई जाए और उत्तराखंड में वनाधिकार कानून का पूर्ण एवं ईमानदार अनुपालन सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने कहा कि वर्षों से वन भूमि पर निवास कर रहे लोगों के अधिकारों को मान्यता देना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

कार्यशाला में वन ग्रामों के बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे। प्रमुख रूप से खीम राम, प्रेम राम, नंदकिशोर, शांति मेहरा, अंजलि रावत, सत्य पटवाल, बालादित्य कांडपाल, उमाकांत, धना देवी, रीना, कशिश, लक्ष्मी, रजनी, सीमा, रोशनी और गोपाल लोधियाल ने अपने विचार रखे और वनाधिकार कानून के तहत अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित संघर्ष की आवश्यकता पर जोर दिया।

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